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*सिद्धांत चतुर्वेदी ने यूपी की जड़ों और भोजपुरी के साथ भाषा से जुड़ी चुनौतियों पर की खुलकर बात*

 *सिद्धांत चतुर्वेदी ने यूपी की जड़ों और भोजपुरी के साथ भाषा से जुड़ी चुनौतियों पर की खुलकर बात* 


अपनी आगामी तथा चर्चित फिल्म ‘दो दीवाने सहर में’ के ट्रेलर लॉन्च के मौके पर सिद्धांत चतुर्वेदी ने एक बेहद निजी और भावनात्मक पहलू साझा किया है। उत्तर प्रदेश के बलिया में पले-बढ़े सिद्धांत ने अपनी जड़ों, भोजपुरी भाषा और मुंबई आने के बाद भाषा व आत्मविश्वास से जुड़ी उन खामोश चुनौतियों पर खुलकर बात की, जिनका सामना अक्सर बाहर से आने वाले युवाओं को करना पड़ता है।


अपने शुरुआती दिनों को याद करते हुए सिद्धांत ने बताया कि बलिया में बिताया गया बचपन न सिर्फ उनके उच्चारण बल्कि उनकी सोच का भी अहम हिस्सा रहा है। श को स कहने के बारे में वे कहते हैं, “घर में बातचीत की भाषा भोजपुरी थी और आज भी मेरी मां भगवान शिव को प्यार से “संकर भगवान” कहती हैं।” हालांकि सिद्धांत के लिए ये सिर्फ यादें नहीं, बल्कि भावनात्मक जुड़ाव हैं, जो ‘दो दीवाने सहर में’ की स्क्रिप्ट पढ़ते वक्त और गहरे हो गए थे।


सिद्धांत आगे कहते हैं, “मेरे लिए यह हमेशा से काफी पर्सनल रहा है। जब मैं मुंबई आया, तो पहले पांच-छह साल मेरी हिंदी भी टूटी-फूटी थी। मैं भोजपुरी में ही बात करता था।”



उन्होंने यह भी बताया कि भाषा किस तरह धीरे-धीरे आत्मविश्वास को प्रभावित करती है, खासकर तब, जब आप अपनी क्षेत्रीय पहचान के साथ किसी बड़े शहर में कदम रखते हैं। हालांकि टूटी हिंदी में बात करना, धीरे-धीरे अंग्रेज़ी सीखना और ‘स’ व ‘श’ जैसे उच्चारणों को लेकर सजग होना, ये सब ऐसी बातें हैं, जिनसे कई लोग गुजरते हैं, लेकिन कम ही खुलकर बोलते हैं।


“बात यह नहीं है कि आप यूपी, बिहार, राजस्थान, गुजरात, नॉर्थ-ईस्ट या नेपाल से आते हैं, बात ये है कि भाषा की दीवार होती ही है। और जब आप किसी चीज़ को लेकर कॉन्शस हो जाते हैं, तो वह आपके आत्मविश्वास को प्रभावित करती है।” सिद्धांत ने कहा।


गौरतलब है कि बेहद भावुकता के साथ कहे अपने दिल की बात को और भी मानवीय बना देती है सिद्धांत की ईमानदारी, जिसमें उन्होंने सीखने और खुद को ढालने की प्रक्रिया को बिना किसी दिखावे के स्वीकार किया। उन्होंने बताया कि कैसे उन्होंने बिना किसी औपचारिक ट्रेनिंग के, जीवन के अनुभवों से बोलचाल सुधारी। यहां तक कि फर्राटेदार अंग्रेज़ी बोलनेवाली चेन्नई की लड़की के साथ पहली बार प्यार में पड़ना भी उनके लिए भावनात्मक ही नहीं, भाषाई सीख का भी हिस्सा था।


हालांकि उनकी सच्ची और बिना बनावट की बातों ने ‘दो दीवाने शहर में’ में उनके किरदार को और गहराई दी है, जहां भावनात्मक संवेदनशीलता और सच्चाई कहानी का केंद्र है। घर की भोजपुरी बातचीत से लेकर हिंदी सिनेमा में अपनी आवाज़ खोजने तक का सिद्धांत का सफर उन अनगिनत युवाओं की कहानी है, जो सपनों के साथ एक शहर से दूसरे शहर आते हैं।


दिलचस्प बात ये है कि भाषा, पहचान और आत्मविश्वास पर बिना किसी चमक-दमक के बात करते हुए सिद्धांत चतुर्वेदी एक बार फिर साबित करते हैं कि दर्शक उनसे इसलिए जुड़ाव महसूस करते हैं क्योंकि वे खुद एक ऐसे कलाकार के रूप में उनसे जुड़ते हैं, जिनकी यात्रा बनावटी नहीं, बल्कि सच्ची, मेहनत से अर्जित की गई और गहराई से भारतीय है।

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